旅客们如果想坐大巴从老挝北部最大城镇——琅南塔向南到首都万象,就必须为长达18个小时的痛苦旅程做好准备,而且这还是在天气良好的前提下。
中国正在改变这一状况。新的高速铁路——中老铁路于2016年下半年动工,计划于2021年底完工。届时这条414公里长的铁路将从中老边境的磨丁一路蜿蜒南下,直到老泰边境的首都万象。新的列车之旅将缩短至仅仅3个小时。
这条投资60亿美元的铁路是中国“一带一路”宏伟倡议的一部分,该倡议下的基础设施项目遍布世界各地,主要由中国通过直接投资和提供贷款的方式进行融资。为了贯彻“一带一路”倡议促进互联互通的初衷,中老铁路将向南与泰国、马来西亚和新加坡相连。
老挝政府希望这条客货运铁路能促进旅游和贸易,为其700万人民带来繁荣。但由于该国的多山地貌,中老铁路面临着重大的工程挑战:全线只有38%在地面修建,其余部分由170座桥梁和72条隧道组成。
与所有大型基础设施项目一样,中老铁路可能会给环境造成巨大影响,而且问题的早期征兆业已出现。2018年11月初,老挝中部万荣的当地人看到通常水晶般清澈透明的颂河出现了一股黑水。他们追根溯源,发现这股水来自铁路工地的钻探。
在中老铁路终点万象的郊区,坐落着一处生物多样性丰富的湿地——塔銮湖
工程的资金由中老铁路公司提供,中老双方在该公司的出资比例为7:3。按照约定,老挝要在未来五年为其股份支付7.2亿美元,其中2.5亿出自国家预算,其余4.7亿则是从中国进出口银行借来的(利率2.3%)。
去年老挝国债的GDP占比从2017年的61%增加到65%,部分原因就在于从中国各大银行的借贷增加。国际货币基金组织对这个数字十分关切,因为老挝的银矿和铜矿已经接近枯竭,而该国的计税基础很低。
尽管中老铁路对老挝的发展至关重要,但偿还其贷款对该国来说也是难事一桩。
在中老铁路开工仪式上,老挝公共工程与交通运输部部长本占
能源经济与金融分析研究所(简称IEEFA)的一份最新报告显示,中国计划在海外建设更多的燃煤发电厂,其规模超过了德国现有燃煤发电装机。
中国国家气候战略中心主任李俊峰在去年的联合国气候大会上接受采访时说:“不能要求一个比中国更落后的发展中国家现在就开始减少煤炭消费,这是做不到的。”他表示,中国正在利用最清洁、超低排放的技术帮助其他国家满足煤电需求。
IEEFA报告指出,中方投资的燃煤电厂已经变得更加高效,在建电厂基本都不属于最高碳的类型。这种煤电建设与清洁化并行的趋势其实恰好反映了中国自身的能源发展轨迹。尽管提高燃煤效率能够带来一些环境和健康效益,但仍然有违全球去碳化的号召。
中国海外燃煤电厂发展势头强劲
中国并不是全球煤电发展的新生力量。2017年的一份研究发现,2001年到2016年,中国企业和银行先后参与了240个海外煤电项目的建设,总装机容量达到2.51亿千瓦。仅对公共财政的分析就显示,中国已经成为近年来海外煤电行业的最大支持者。
IEEFA的这份新的报告则是关于中国未来的发展规划。中方参与煤电项目建设的势头似乎并没有趋缓迹象;中方金融机构和企业已经承诺或提议为中国境外四分之一的在建煤电项目提供资金,而这些项目分别分布于23个国家,总装机容量约为10.2亿千瓦。
中方在某些项目中的资助承诺直接来自高层。比如2016年习近平主席对孟加拉国进行国事访问期间,中孟两国就共同签署协议,由中方出资援助建设4个煤电项目。在中国政策性银行低息贷款的支持下,不少中国国有能源公司也享受着高层产业政策的支持,大举进军海外。
辛达冯称:“铁路一旦建成,将造福老挝各族人民,便利交通、降低成本,刺激工农业、旅游、投资和贸易发展。”,面积20平方公里。这里于2017年底被划为经济特区,此后购物中心、写字楼、学校和住宅开始拔地而起,投资部分来自中国。
老挝是一个发展中国家,基础设施的重大改善得到了很多人的欢迎。但这条高速铁路给他们以及东南亚其他地方带来的长期变化又是什么呢?随着工程完成了20%以上,摄影师苏利耶・泉开始了从磨丁到万象的旅行,在32个新铁路站点中选了几处探访,也游览了其间大片的农村地区。
Wednesday, June 19, 2019
Monday, May 27, 2019
केदारनाथ: पीएम मोदी ने गुफा में ध्यान लगाया या 'होटल' में?
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सुन्नी जिहादी समूह जैसे- आईएसआईएस और
अल क़ायदा ने ज़्यादा अमरीकी नागरिकों की हत्या है और इन्हें भारी मदद ईरान
से नहीं बल्कि सुन्नी नेतृत्व वाले देश और ख़ास कर सऊदी अरब से मिल रही
है.
2016 में अमरीका में 9/11 के हमले की जांच रिपोर्ट के कई ऐसे तथ्य सामने आए थे जिसमें कहा गया था कि विमान हाइजैकर्स को उन लोगों से मदद मिली जो शायद सऊदी सरकार के संपर्क में थे. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार इस साल की शुरुआत में सऊदी और यूएई ने यमन में अल क़ायदा को अमरीका में बने हथियार मुहैया कराए हैं.
2014 में पेंटागन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान की सैन्य रणनीति में आत्मसुरक्षा केंद्र में है. अमरीका और इसराइल के कई विशेषज्ञों का यह आकलन रहा है कि ईरान अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहता है न कि किसी पर हमला करने की आकांक्षा रखता है.
1953 में अमरीका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी. मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक़्त में अपदस्थ करने का काम अमरीका ने पहली बार ईरान में किया. लेकिन यह आख़िरी नहीं था. इसके बाद अमरीका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई.
बीएल राणा बताते हैं कि पिछले साल तक तो केदारनाथ घाटी में इस तरह की एक ही गुफा थी लेकिन इस साल एक और गुफ़ा का निर्माण पूरा हो गया है. आने वाले समय में ऐसी ही कुछ और गुफाओं के निर्माण की योजना है.
वो बताते हैं कि ये गुफाएं केदारनाथ डेवलपमेंट वर्क्स के तहत बनाई गई हैं. वाई-फ़ाई की सुविधा पर राणा कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ गुफा में ही वाई-फ़ाई की सुविधा है, वाई-फ़ाई की सुविधा पूरे केदारपुरी में है और गुफा उसकी रेंज में है या नहीं ये बता पाना मुश्किल है.
अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि अगर ईरान युद्ध में गया तो उसका अस्तित्व मिट जाएगा. लेकिन अमरीका को भी युद्ध के ख़तरों का अंदाज़ा है क्योंकि 2003 में वो इराक़ में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए ऐसा कर चुका है.
इस्लामिक क्रांति के 40 सालों बाद ईरान ने कई संकट देखे हैं लेकिन इस बार का ख़तरा काफ़ी गंभीर है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान अगर झुकता है तब भी हारेगा और लड़ता है तब भी जीत नहीं मिलेगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतिम चरण का चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद केदारनाथ पहुंचे थे. मौक़ा बुद्ध पूर्णिमा का था. जिसके बाद उनकी कई तस्वीरें वायरल हो गईं.
तस्वीर के वायरल होने की कई वजहें रहीं. एक ओर जहां विपक्ष ने कहा कि यह आचार संहिता का उल्लंघन है वहीं प्रधानमंत्री ने 17 घंटे बाद गुफ़ा से बाहर निकलते ही चुनाव आयोग को धन्यवाद कहा कि आयोग ने उन्हें एकांत में ध्यान लगाने का वक़्त दिया.
गढ़वाल मंडल विकास निगम के महाप्रबंधक बीएल राणा का कहना है कि इस बात में कोई शक़ ही नहीं है कि प्रधानमंत्री के यहां आने से यह जगह चर्चा में आ गई है और लोग इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाह रहे हैं.
गुफा की बढ़ी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने इस गुफा की बुकिंग को फिलहाल के लिए रोक दिया है. उम्मीद जताई जा रही है कि जून के पहले महीने से एक बार फिर बुकिंग शुरू हो जाएगी.
लेकिन क्या ये वाकई एक गुफ़ा ही है या कुछ और...
गढ़वाल मण्डल विकास निगम की वेबसाइट पर इस गुफ़ा से जुड़ी जानकारियां मौजूद है. गुफा में रुकने के नियम और शर्तें पढ़कर लगता है कि हम किसी होटल के नियम-शर्त पढ़ रहे हैं.
यहां तक की वेबसाइट पर ख़ुद भी इसके लिए कई जगह होटल शब्द का इस्तेमाल किया है.
इस गुफा का नाम रूद्र ध्यान गुफा है.
क्या है क़ीमत
बीएल राणा बताते हैं कि अभी तो इसकी क़ीमत 990 रुपये ही रखी गई है लेकिन आने वाले वक़्त में ये क़ीमत बदल भी सकती है और यह पूरी तरह लोगों के रिस्पॉन्स पर निर्भर करेगी.
हालांकि शुरुआत में इसकी क़ीमत 3000 रुपये रखी गई थी लेकिन बहुत अधिक लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं थी इसलिए इसकी क़ीमत घटा दी गई.
राणा उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में लोगों की रुचि इस ओर बढ़ेगी.
गढ़वाल मण्डल विकास निगम के अंतर्गत आने वाली यह गुफा केदारनाथ धाम पहाड़ियों से क़रीब एक किलोमीटर ऊपर है. (केदारनाथ मंदिर समुद्रतल से क़रीब 11,500 फ़ीट की ऊंचाई पर है).
इस गुफा का मुंह केदारनाथ मंदिर की ओर खुलता है. इस प्राकृतिक गुफा के बाहरी हिस्से को स्थानीय पत्थरों से तैयार किया गया है और गुफा के मुख्य द्वार पर सुरक्षा के लिए लकड़ी का दरवाज़ा लगा हुआ है.
2016 में अमरीका में 9/11 के हमले की जांच रिपोर्ट के कई ऐसे तथ्य सामने आए थे जिसमें कहा गया था कि विमान हाइजैकर्स को उन लोगों से मदद मिली जो शायद सऊदी सरकार के संपर्क में थे. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार इस साल की शुरुआत में सऊदी और यूएई ने यमन में अल क़ायदा को अमरीका में बने हथियार मुहैया कराए हैं.
2014 में पेंटागन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान की सैन्य रणनीति में आत्मसुरक्षा केंद्र में है. अमरीका और इसराइल के कई विशेषज्ञों का यह आकलन रहा है कि ईरान अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहता है न कि किसी पर हमला करने की आकांक्षा रखता है.
1953 में अमरीका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी. मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो.
किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक़्त में अपदस्थ करने का काम अमरीका ने पहली बार ईरान में किया. लेकिन यह आख़िरी नहीं था. इसके बाद अमरीका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया.
1953 में ईरान में अमरीका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी. इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट ख़त्म नहीं हुई.
बीएल राणा बताते हैं कि पिछले साल तक तो केदारनाथ घाटी में इस तरह की एक ही गुफा थी लेकिन इस साल एक और गुफ़ा का निर्माण पूरा हो गया है. आने वाले समय में ऐसी ही कुछ और गुफाओं के निर्माण की योजना है.
वो बताते हैं कि ये गुफाएं केदारनाथ डेवलपमेंट वर्क्स के तहत बनाई गई हैं. वाई-फ़ाई की सुविधा पर राणा कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ गुफा में ही वाई-फ़ाई की सुविधा है, वाई-फ़ाई की सुविधा पूरे केदारपुरी में है और गुफा उसकी रेंज में है या नहीं ये बता पाना मुश्किल है.
अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कह रहे हैं कि अगर ईरान युद्ध में गया तो उसका अस्तित्व मिट जाएगा. लेकिन अमरीका को भी युद्ध के ख़तरों का अंदाज़ा है क्योंकि 2003 में वो इराक़ में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए ऐसा कर चुका है.
इस्लामिक क्रांति के 40 सालों बाद ईरान ने कई संकट देखे हैं लेकिन इस बार का ख़तरा काफ़ी गंभीर है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान अगर झुकता है तब भी हारेगा और लड़ता है तब भी जीत नहीं मिलेगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
लोकसभा चुनाव ख़त्म हो चुके हैं और अब इंतज़ार सिर्फ़ नतीजों का है.
हालांकि इस दौरान एग्ज़िट पोल के क़यास को जहां बीजेपी दावों की हक़ीकत बता रही है
वहीं विपक्ष का कहना है कि एग्ज़िट पोल सिर्फ़ क़यास मात्र ही हैं. इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतिम चरण का चुनाव प्रचार ख़त्म होने के बाद केदारनाथ पहुंचे थे. मौक़ा बुद्ध पूर्णिमा का था. जिसके बाद उनकी कई तस्वीरें वायरल हो गईं.
तस्वीर के वायरल होने की कई वजहें रहीं. एक ओर जहां विपक्ष ने कहा कि यह आचार संहिता का उल्लंघन है वहीं प्रधानमंत्री ने 17 घंटे बाद गुफ़ा से बाहर निकलते ही चुनाव आयोग को धन्यवाद कहा कि आयोग ने उन्हें एकांत में ध्यान लगाने का वक़्त दिया.
गढ़वाल मंडल विकास निगम के महाप्रबंधक बीएल राणा का कहना है कि इस बात में कोई शक़ ही नहीं है कि प्रधानमंत्री के यहां आने से यह जगह चर्चा में आ गई है और लोग इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाह रहे हैं.
गुफा की बढ़ी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने इस गुफा की बुकिंग को फिलहाल के लिए रोक दिया है. उम्मीद जताई जा रही है कि जून के पहले महीने से एक बार फिर बुकिंग शुरू हो जाएगी.
लेकिन क्या ये वाकई एक गुफ़ा ही है या कुछ और...
गढ़वाल मण्डल विकास निगम की वेबसाइट पर इस गुफ़ा से जुड़ी जानकारियां मौजूद है. गुफा में रुकने के नियम और शर्तें पढ़कर लगता है कि हम किसी होटल के नियम-शर्त पढ़ रहे हैं.
यहां तक की वेबसाइट पर ख़ुद भी इसके लिए कई जगह होटल शब्द का इस्तेमाल किया है.
इस गुफा का नाम रूद्र ध्यान गुफा है.
- इसके भीतर बिजली और पीने के पानी की व्यवस्था है.
- सुबह की चाय, सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, शाम की चाय और रात का खाना उपलब्ध कराया जाता है. हालांकि ये सारी चीज़ें एक नियत समय पर ही उपलब्ध कराई जाती हैं लेकिन आग्रह करके समय बदलवाया जा सकता है.
- यह गुफा पूरी तरह से एकांत में रहने के लिए बनाई गई है लेकिन आपातकाल की स्थिति में गढ़वाल मण्डल विकास निगम के मैनेजर से संपर्क किया जा सकता है.
- इस गुफा में एक घंटी भी लगी हुई है. जो गुफा के पास मौजूद अटेंडेंट को बुलाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं.
- कोई भी शख़्स इस गुफा को कम से कम तीन दिन के लिए बुक करा सकता है
- जो शख़्स बुकिंग करा रहा है उसे बुकिंग की तारीख़ से दो दिन पहले गढ़वाल मण्डल विकास निगम गुप्तकाशी में रिपोर्ट करना ज़रूरी है. पहले गुप्तकाशी में और उसके बाद केदारनाथ में बुकिंग कराने वाले शख़्स की मेडिकल जांच की जाएगी और अगर उसे मेडिकली और फ़िजिकली फ़िट पाया गया तभी उसे गुफ़ा में ठहरने की अनुमति दी जाएगी.
- एक बार में एक ही शख़्स इस गुफा में रुक सकता है
- एकबार अगर आपने बुकिंग कर ली तो बुकिंग कैंसिल कराने के बाद आपको रिफंड नहीं मिलेगा. चाहे वजह कुछ भी हो.
- सिर्फ़ और सिर्फ़ गढ़वाल मण्डल विकास निगम की वेबसाइट से ही यहां के लिए बुकिंग हो सकती है.
- नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट या सेल्फ़ डिक्लेयरेशन फॉर्म भरना ज़रूरी है.
क्या है क़ीमत
बीएल राणा बताते हैं कि अभी तो इसकी क़ीमत 990 रुपये ही रखी गई है लेकिन आने वाले वक़्त में ये क़ीमत बदल भी सकती है और यह पूरी तरह लोगों के रिस्पॉन्स पर निर्भर करेगी.
हालांकि शुरुआत में इसकी क़ीमत 3000 रुपये रखी गई थी लेकिन बहुत अधिक लोगों को इसके बारे में जानकारी नहीं थी इसलिए इसकी क़ीमत घटा दी गई.
राणा उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में लोगों की रुचि इस ओर बढ़ेगी.
गढ़वाल मण्डल विकास निगम के अंतर्गत आने वाली यह गुफा केदारनाथ धाम पहाड़ियों से क़रीब एक किलोमीटर ऊपर है. (केदारनाथ मंदिर समुद्रतल से क़रीब 11,500 फ़ीट की ऊंचाई पर है).
इस गुफा का मुंह केदारनाथ मंदिर की ओर खुलता है. इस प्राकृतिक गुफा के बाहरी हिस्से को स्थानीय पत्थरों से तैयार किया गया है और गुफा के मुख्य द्वार पर सुरक्षा के लिए लकड़ी का दरवाज़ा लगा हुआ है.
Thursday, January 17, 2019
تتساءل صحف عربية هل جولته "لطمأنة الحلفاء أم لضمان موافقتهم على خطط أمريكا؟
ناقشت صحف عربية جولة وزير الخارجية الأمريكي، مايك بومبيو، للشرق الأوسط، التي بدأها أمس بالأردن.
وقالت
"النهار" اللبنانية إن جولة بومبيو "تهدف خصوصاً إلى طمأنة حلفاء واشنطن
إلى أن الولايات المتحدة منخرطة في سوريا بعد الإعلان المفاجئ عن سحب قواتها من هذا البلد".ونقل موقع "عربي21" عن مسؤولين ومحليين سياسيين مصريين أن الزيارة "تهدف إلى وضع النقاط على الحروف، وأخذ موافقات عربية حاسمة بشأن الخطط الأمريكية الخاصة برؤية الرئيس الأمريكي دونالد ترامب في التعامل مع تلك الملفات في ظل التقارب العربي-السوري، والعربي-الإسرائيلي الأخيرين".
"هل من نتائج حاسمة؟"
ويقول عبد الله المجالي في جريدة "السبيل" الأردنية إن "أهمية زيارة وزير الخارجية الأمريكي تأتي في سياق استشراف الأردن من كبير الدبلوماسية الأمريكية لحقيقة القرار الأمريكي حول الانسحاب من سوريا".
ويضيف: "ورغم أن جل التحليلات أغفلت أثر القرار في الأردن، وذهبت باتجاه تحليل أثره في الأكراد وفي تركيا بالدرجة الأولى، وفي النظام السوري وحليفيه الإيراني والروسي بدرجة ثانية، إلا أن القرار له أثر كبير في الجانب الأردني، وعمّان معنية تماما بمعرفة تفاصيل التوجه الأمريكي خصوصا فيما يتعلق بالجبهة السورية الجنوبية الشرقية".
وتساءل عوض بن سعيد باقوير في صحيفة "عُمان" العمانية "جولة بومبيو هل من نتائج حاسمة؟"
ويقول الكاتب: "التحرك الدبلوماسي الأمريكي للمنطقة العربية، الذي بدأ أمس الثلاثاء بزيارة وزير الخارجية الأمريكي مايك بومبيو للعاصمة الأردنية عمّان، تكتسب أهمية خاصة من خلال القضايا التي سوف تكون مدار بحث مع الدول التي سوف يزورها وهي دول مجلس التعاون الخليجي والأردن ومصر".
ويضيف: "يأتي هذا التحرك الأمريكي في الوقت الذي تشهد فيه المنطقة تحديات حقيقية، لعل في مقدمتها الخلاف مع إيران والأزمة الخليجية ومسألة الانسداد السياسي لعملية السلام بين الفلسطينيين والإسرائيليين، علاوة على موضوع الإرهاب والتحالف المقترح من قبل واشنطن، كما أن تلك الزيارة تعطي مؤشرا على أهمية نجاح خطة السلام في اليمن والموضوع السوري في ظل تنامي التقارب العربي مع الدولة السورية".
"قائمة تساؤلات مشروعة"
وكتب أشرف العشري في "الأهرام" المصرية نقلاً عن "صديق دبلوماسي" قوله إن زيارة الوزير لمصر سبقتها اتصالات ومشاورات وجهد مكثف "لإقناع الجانب الأمريكي بألا تكون زيارة روتينية، (إذ) فات أوان مثل هذه الزيارات وانتهى إلى غير رجعة، (وإذ أصبحت) قضايا المنطقة ملتهبة وبراميل البارود فيها قابلة للانفجار في أي لحظة".
وأضاف الكاتب نقلاً عن الدبلوماسي: "أعددنا له قائمة تساؤلات مشروعة حول الموقف الأمريكي من كيفية التعاطي مع قضايا المنطقة في ضوء تغييرات جوهرية فجائية نجمت عن قرار الانسحاب الأمريكي من سوريا وترك الساحة هناك لبعض القوى المنفلتة المارقة مثل إيران وتركيا وحتى حقيقة 'صفقة القرن'، وهل هو مشروع قائم وجاهز بالفعل، وما هو مضمونه وجوهره، خاصة أن الفلسطينيين والمصريين ومعهم العرب بالإجماع لن يقبلوا هذه المرة تمرير الوهم أو الانتقاص من الحد الأدنى من المطالب والحقوق المشروعة للشعب الفلسطيني".
وأشار إلى أن "أصعب الإجابات التي سيتعذر على بومبيو الحصول عليها تتعلق بإمكان إحداث الانفراجة الأمريكية المطلوبة في قضية العقوبات من قبل الرباعي العربي (مصر والسعودية والإمارات والبحرين) تجاه قطر ... وكذلك الحال لقضايا عديدة وموسعة كعملية السلام وصفقة القرن والانسحاب الأمريكي من سوريا وقصة الفراغ الأمريكي في الشرق الأوسط، والأوضاع في ليبيا، وحتى علاقات التهديد والوعيد الأمريكي الإيراني".
وتقول مينا العريبي في "الشرق الأوسط" اللندنية إن زيارة بومبيو تأتي "تزامناً مع مغادرة كل من الجنرال المتقاعد جيمس ماتيس منصب وزير الدفاع الأمريكي، والجنرال المتقاعد جون كيلي منصب كبير موظفي البيت الأبيض. وبعد أن كان ماتيس وكيلي من أبرز الوجوه التي يمكن الاعتماد عليها لترويض سياسات الرئيس الأمريكي دونالد ترامب، باتت الإدارة الأمريكية خالية من كبار الشخصيات العسكرية المتقاعدة".
وتضيف: "يصل بومبيو إلى المنطقة وأسئلة كثيرة تحوم حول سياسات ترامب الخارجية، خصوصاً استراتيجيته العسكرية، فقد جاءت استقالة ماتيس من منصبه الشهر الماضي بعد إعلان ترمب المفاجئ سحب القوات الأمريكية من سوريا، لتليها بعد أيام تسريبات بأن ترامب ينوي سحب الآلاف من القوات الأمريكية من أفغانستان".
Tuesday, January 1, 2019
#مدن_السودان_تنتفض: مسيرات تتجه للقصر الرئاسي للمطالبة بتنحي البشير
يخرج المتظاهرون اليوم في احتجاجات متجددة في عدد من المدن السودانية منها العاصمة الخرطوم في مظاهرات دعت
إليها هيئة تجمع الاتحادات المهنية المستقلة.
وينوي المتظاهرون التوجه إلى القصر الرئاسي للمطالبة بتنحي الرئيس السوداني عمر البشير. وقد استخدم رواد مواقع التواصل في السودان هاشتاغ #مدن_السودان_تنتفض الذي ورد عليه أكثر من سبعة آلاف تغريدة على مدار أربع والعشرين ساعة الماضية.
بينما ورد على الهاشتاغ الذي يستخدمه السودانيون منذ فترة سبعين ألف تغريدة على مدار الأيام السبعة الماضية.
واستخدم المغردون الهاشتاغ لنشر تطورات الاحتجاجات.
وتداول رواد مواقع التواصل السودانيين لقطات من مسيرات احتجاجية محدودة خرجت في عدد من الدول الأجنبية نظمها سودانيون تضامنا مع رفاقهم في السودان.
تصدر اسم محمد صلاح لاعب ليفربول الإنجليزي، قائمة الأسماء الأكثر بحثا على غوغل لسنة 2018.
لا
شك في أن رحلة صلاح من ناد محلي في مصر إلى ليفربول جعلت الكثير من الشباب
في العالم العربي يعتبرونه قدوة لهم ومثالا للعزيمة والإصرار.وتضج مواقع التواصل كل يوم بصور اللاعب المصري مع كل هدف يسجله أو ظهور جديد له.
كما تمتلأ الصفحات الكروية على مواقع التواصل الاجتماعي بتعليقات عربية تتغنى بصلاح وتصرفاته داخل الملعب وخارجه.
وعادة ما ترفق تلك الصور بهاشتاغ أو عبارة "الله على أخلاقك يا فخر العرب".
انتشرت عبارة "الله على أخلاقك يا فخر العرب" في البداية كتعليق على أداء محمد صلاح داخل الملعب أو تصرفاته خارجه لكنها لم تلبث أن تحولت إلى مادة فكاهية تجمع بين النكات والصور الكاريكاتورية لتسلط الضوء على ما اعتبره البعض مبالغة في الثناء على صلاح.
في المقابل، يرى آخرون أن صلاح يستحق كل ذلك المدح لأنه جمع بين المهارة الرياضية ودماثة الأخلاق.
ويعتمد مطلقو الصور الكوميدية على الخدع البصرية لإظهار صلاح كرجل خارق يصنع المعجزات.
الألعاب النارية انطلقت احتفالا برأس السنة الجديدة لمدة 12 دقيقة من أعلى جسر مرفأ سيدني في أستراليا.
إيريك إيتشارت: أخذت هذه
اللقطة في القطار السريع، الذي يربط بين لندن وباريس، حيث كنت في طريقي إلى
فرنسا، لقضاء عطلة نهاية الأسبوع. هذا الرجل، الذي كان يجلس بالقرب مني،
أمضي الرحلة وهو ينظر من النافذة.
سوجيث سودارسان: صبية ينتظرون ركل ضربة ركنية، خلال مباراة لكرة القدم على شاطئ أرثونكال، في ولاية كيرالا بالهند.
طالما عُدت الإمارات وجهة للأجانب أصحاب المهن الساعين لدخل مرتفع، لكن المغتربين على أرض الواقع يقولون إن
الأمور في الإمارات لم تعد كسابق عهدها.
في عام 2016، قررت أليسون
سايمونز، مستشارة الاتصالات، أن تغادر موطنها بالمملكة المتحدة، لتستقر في
دبي، حيث الشمس الساطعة، والحياة الاجتماعية الأكثر تفاعلا ونشاطا. لكن لم يكد يمضي عامان حتى عادت سايموندز إلى المملكة المتحدة.وتقول سايمونز إنها أمضت 12 شهرا في البحث عن وظيفة مناسبة، رغم أنها كان لديها شبكة معارف شخصية ومهنية لا يستهان بها في الإمارات، وحتى الوظيفة التي عثرت عليها كانت بعقد مؤقت لمدة عام.
وبالرغم من أن صافي دخلها في الإمارات كان أعلى منه في المملكة المتحدة، لأن الإمارات لا تفرض ضريبة على الدخل، إلا أنها لم تشعر بالأمان الوظيفي بحكم عملها بعقد محدد المدة. وكانت تضطر لدفع إيجارات باهظة لمسكنها وسيارتها بموجب عقود إيجار قصيرة الأجل.
وقبل ثمانية أسابيع من انتهاء عقدها، شرعت سايموندز، البالغة من العمر 45 عاما، في البحث عن وظيفة جديدة. وتقول: "لم أجد أي وظيفة براتب معقول، ولهذا قررت العودة إلى بلدي".
وتردف قائلة: "أود أن أعود إلى هناك مستقبلا، ولكنني أرى أن الأوضاع الآن غير مواتية للعودة والعمل هناك من جديد، إذ زاد عدد المغتربين الذين يغادرون البلاد، ويجد كثير من المهنيين المهرة وذوي الخبرة صعوبة بالغة في العثور على وظائف جديدة".
أصحاب الشركات وسوق العمل
يضم هذا البلد الغني بالنفط ملايين المغتربين، على اختلاف مستوياتهم وجنسياتهم، الذين أغرتهم الدخول المعفاة من الضرائب والشمس الساطعة طوال العام على الانتقال للعيش فيه.
ويعيش معظم الأجانب في أبو ظبي ودبي، مركزي المال والأعمال في الإمارات، واشتهرت دبي أيضا بمنتجعاتها الفاخرة ومبانيها الشاهقة، ومراكز التسوق البراقة، التي جعلت منها وجهة جاذبة للسياح.
Tuesday, December 11, 2018
340 أسرة منتجة وتاجر صغير يشاركون في معرض «صنعتي 2018»
يشارك أكثر من 340 أسرة منتجة وتاجرا صغيرا ووجهة
حاضنة، في معرض الأسر المنتجة «صنعتي 2018» في نسخته الرابعة، الذي تُنظمه
غرفة الشرقية بالتعاون مع شركة الظهران إكسبو، الذي افتتحه أمير المنطقة الشرقية سعود بن نايف بن عبدالعزيز أمس، ويستمر خمسة أيام.
وعبر أمير المنطقة خلال جولته عن إعجابه بإبداعات الأسر المنتجة في مختلف المجالات، والاحترافية الكبيرة التي ظهروا عليها خلال النسخة الرابعة للمعرض، وتنوع معروضات الأسر المشاركة فيه ما بين الملابس والعطور والأطعمة والحلويات والمنتجات الحرفية التراثية وغيرها.
من جانبه، أوضح رئيس غرفة الشرقية عبدالحكيم الخالدي أن الغرفة عملت خلال النسخ الثلاث الماضية على أن يُمثل هذا المعرض موسما للأسر المنتجة لعرض منتجاتهم وتحقيق أهدافهم فيما يتعلق بتعريفهم بالمستهلكين، متمنيا أن يؤدي المعرض إلى دعم الأسر المنتجة والذهاب بها نحو آفاق أرحب من العمل الحر، وأن يكون قيمة مضافة في الاقتصاد الوطني الآخذ في النمو بسواعد أبناء هذا الوطن المعطاء.
وأشار إلى أن الحراك الرسمي بشأن الأسر المنتجة، التي جاءت ضمن مستهدفات رؤية 2030، بجعلها قطاعا ذا قيمة مضافة في الاقتصاد الوطني، وما تبعها من موافقة مجلس الوزراء على اللائحة التنفيذية لتنظيم عمل الأسر المنتجة، وفر مزيدا من الاهتمام بقطاع الأسر المنتجة من ناحية التمويل لهذه الأسر أو ضبط طريقة عملها بجعلها كيانات تعتمد على ذاتها، وهو نفسه ما تسعى إلى تحقيقه غرفة الشرقية منذ انطلاقها في تدشين معرضها السنوي للأسر المنتجة.
وأفاد الخالدي أن الغرفة منذ أن تبنت فكرة إقامة المعرض، وهي تهدف أن تكون الأسر المنتجة في المنطقة الشرقية رقما فاعلاً في الاقتصاد الوطني، فاجتهدت بوضع الأسر المنتجة ضمن حيز اهتمامها، وذلك بالاستمرار في طرح المبادرات وإقامة الفعاليات الداعمة لهم، منوها إلى أن الغرفة كانت قد أسست مركزا مختصا بالمسؤولية الاجتماعية، وأوكلت إليه تنفيذ الأنشطة المتعلقة بالأسر المنتجة ومتابعتها والعمل على تطويرها.
من ناحيته، أشار الأمين العام للغرفة عبدالرحمن الوابل إلى أن «صنعتي 2018» بجانب أنه منفذ لعرض منتجات الأسر المنتجة، يُعزّز كذلك من تقويتها وقدرتها التنافسية نحو اهتمام أكبر بالجودة، لافتا إلى أن هذه النسخة الرابعة، تأتي استمرارا لما توليه الغرفة من أهمية للأسر المنتجة.
وأوضح أن معرض هذا العام يضم 341 جناحاً، منها 299 أسرة منتجة تعرض العديد من المنتجات المتنوعة ما بين منتجات الملابس أو المأكولات بأنواعها، فضلاً عن أجنحة العطور وأعمال الديكور، وهناك تسعة أجنحة لعرض المنتجات الحرفية التراثية، إلى جانب أجنحة الجمعيات والمراكز التنموية الحاضنة للأسر المنتجة، حيث يشهد المعرض مشاركة (20) جمعية ومركزا تنمويا من الجمعيات والمراكز التي تحتضن أعمال الأسر المنتجة، إضافة إلى 13 ركناً للتاجر الصغير، الذي حقق نجاحا كبيرا في الأعوام السابقة، وركن لعرض منتجات نزيلات إصلاحية الدمام، إضافة إلى حديقة الأطفال من سن 3- 10 سنوات، التي تحتوي على عدد من العروض الجاذبة للأطفال.
وعبر أمير المنطقة خلال جولته عن إعجابه بإبداعات الأسر المنتجة في مختلف المجالات، والاحترافية الكبيرة التي ظهروا عليها خلال النسخة الرابعة للمعرض، وتنوع معروضات الأسر المشاركة فيه ما بين الملابس والعطور والأطعمة والحلويات والمنتجات الحرفية التراثية وغيرها.
من جانبه، أوضح رئيس غرفة الشرقية عبدالحكيم الخالدي أن الغرفة عملت خلال النسخ الثلاث الماضية على أن يُمثل هذا المعرض موسما للأسر المنتجة لعرض منتجاتهم وتحقيق أهدافهم فيما يتعلق بتعريفهم بالمستهلكين، متمنيا أن يؤدي المعرض إلى دعم الأسر المنتجة والذهاب بها نحو آفاق أرحب من العمل الحر، وأن يكون قيمة مضافة في الاقتصاد الوطني الآخذ في النمو بسواعد أبناء هذا الوطن المعطاء.
وأشار إلى أن الحراك الرسمي بشأن الأسر المنتجة، التي جاءت ضمن مستهدفات رؤية 2030، بجعلها قطاعا ذا قيمة مضافة في الاقتصاد الوطني، وما تبعها من موافقة مجلس الوزراء على اللائحة التنفيذية لتنظيم عمل الأسر المنتجة، وفر مزيدا من الاهتمام بقطاع الأسر المنتجة من ناحية التمويل لهذه الأسر أو ضبط طريقة عملها بجعلها كيانات تعتمد على ذاتها، وهو نفسه ما تسعى إلى تحقيقه غرفة الشرقية منذ انطلاقها في تدشين معرضها السنوي للأسر المنتجة.
وأفاد الخالدي أن الغرفة منذ أن تبنت فكرة إقامة المعرض، وهي تهدف أن تكون الأسر المنتجة في المنطقة الشرقية رقما فاعلاً في الاقتصاد الوطني، فاجتهدت بوضع الأسر المنتجة ضمن حيز اهتمامها، وذلك بالاستمرار في طرح المبادرات وإقامة الفعاليات الداعمة لهم، منوها إلى أن الغرفة كانت قد أسست مركزا مختصا بالمسؤولية الاجتماعية، وأوكلت إليه تنفيذ الأنشطة المتعلقة بالأسر المنتجة ومتابعتها والعمل على تطويرها.
من ناحيته، أشار الأمين العام للغرفة عبدالرحمن الوابل إلى أن «صنعتي 2018» بجانب أنه منفذ لعرض منتجات الأسر المنتجة، يُعزّز كذلك من تقويتها وقدرتها التنافسية نحو اهتمام أكبر بالجودة، لافتا إلى أن هذه النسخة الرابعة، تأتي استمرارا لما توليه الغرفة من أهمية للأسر المنتجة.
وأوضح أن معرض هذا العام يضم 341 جناحاً، منها 299 أسرة منتجة تعرض العديد من المنتجات المتنوعة ما بين منتجات الملابس أو المأكولات بأنواعها، فضلاً عن أجنحة العطور وأعمال الديكور، وهناك تسعة أجنحة لعرض المنتجات الحرفية التراثية، إلى جانب أجنحة الجمعيات والمراكز التنموية الحاضنة للأسر المنتجة، حيث يشهد المعرض مشاركة (20) جمعية ومركزا تنمويا من الجمعيات والمراكز التي تحتضن أعمال الأسر المنتجة، إضافة إلى 13 ركناً للتاجر الصغير، الذي حقق نجاحا كبيرا في الأعوام السابقة، وركن لعرض منتجات نزيلات إصلاحية الدمام، إضافة إلى حديقة الأطفال من سن 3- 10 سنوات، التي تحتوي على عدد من العروض الجاذبة للأطفال.
Wednesday, November 28, 2018
चीनी से भी ज्यादा खतरनाक है सोडा, बढ़ जाता है टाइप 2 डायबिटीज का खतरा
क्या आप भी हर मीठी चीज को देखकर डर जाते हैं, उसे खाने से पहले दस बार
सोचते हैं। आपको लगता है कि इससे कहीं शुगर न बढ़ जाए। लेकिन कनाडा में हुए
एक नए अध्ययन में कहा गया है कि हर मीठी चीज नुकसान नहीं करती है। प्राकृतिक रूप से मीठे खाद्य पदार्थ से कोई खतरा नहीं होता है। खतरा है तो
सिर्फ कृत्रिम रूप से मीठी चीजों से। खासतौर पर सोडा, डिब्बाबंद जूस या अन्य पेय पदार्थ।
कृत्रिम रूप से मीठे पेय से बनाएं दूरी
कनाडा के सेंट माइकल हॉस्पिटल और टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 155 अध्ययनों के नतीजों को संकलित कर उनकी समीक्षा की और पता लगाया कि फ्रक्टोज शर्करा वाले विभिन्न खाद्य पदार्थ मधुमेह और स्वस्थ्य रोगियों के रक्त शर्करा के स्तर को किस तरह से प्रभावित करते हैं। अध्ययन के बाद शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि कृत्रिम रूप से मीठे पेय लोगों को अन्य शर्करा वाले खाद्य पदार्थों की तुलना में टाइप 2 मधुमेह के खतरे को बढ़ा सकते हैं। अतिरिक्त फ्रक्टोज के साथ ज्यादा ऊर्जा देने वाले और कम पोषक तत्वों से तैयार पेय रक्त शर्करा के स्तर को हानिकारक रूप से बढ़ा देते हैं।
शहद, नेचुरल फ्रूट जूस से खतरा नहीं
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि जिन खाद्य और पेय पदार्थों में प्राकृतिक रूप से फ्रक्टोज मौजूद थे, उनमें कोई जोखिम नहीं मिला जैसे फल, सब्जियां, प्राकृतिक फलों के रस और शहद। जबकि मीठे पेय में जब अलग से फ्रक्टोज डालते हैं तो ये खून में पहुंचकर तेजी से रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ा देते हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. जॉन सिवेनपाइपर ने कहा, अध्ययन नतीजों से मधुमेह की रोकथाम और प्रबंधन में फ्रक्टोज के महत्व को समझ सकते हैं। इसके लिए अभी और बड़े स्तर पर अध्ययन की जरूरत है। उन्होंने आगे कहा, ‘जब तक अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं होती है, तब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवरों को पता होना चाहिए कि रक्त ग्लूकोज पर फ्रक्टोज शर्करा के हानिकारक प्रभाव ऊर्जा और खाद्य स्रोत के बीच होते हैं।
बेकरी की चीजें खाने से बचें
इससे पहले यह स्पष्ट नहीं था कि कौन सी मीठी चीजें खाई जा सकती हैं और कौन सी नहीं। लोग सोचते थे कि जिस भी चीजों में मीठा हो, उसे खाने से परहेज करना चाहिए। नए अध्ययन में इसे और स्पष्ट करते हुए यह समझाया गया है कि कोल्ड ड्रिंक, नाश्ते के लिए खाने वाली डिब्बाबंद चीजें, बेकरी उत्पाद, मीठे पकवान, इन सभी चीजों में अलग से चीनी डाली जाती है, इसलिए ये ज्यादा नुकसानदायक हैं।
अतिरिक्त कैलोरी भी घातक
शोधकर्ताओं की टीम ने अध्ययन में पाया कि फ्रक्टोज शर्करा वाले अधिकांश खाद्य पदार्थों का तब तक रक्त ग्लूकोज के स्तर पर हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है, जब तक कि अतिरिक्त कैलोरी नहीं देते हैं। मधुमेह के रोगियों में फलों रस और फल रक्त ग्लूकोज और इंसुलिन के नियंत्रण पर भी फायदेमंद असर डाल सकता है। लेकिन जिन खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व कम होते हैं और ऊर्जा ज्यादा देते हैं, वो हानिकारक हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि फल की उच्च फाइबर सामग्री रक्त ग्लूकोज के स्तर में सुधार में मदद कर सकती है, क्योंकि यह शर्करा को धीरे-धीरे जारी करता है।
कृत्रिम रूप से मीठे पेय से बनाएं दूरी
कनाडा के सेंट माइकल हॉस्पिटल और टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 155 अध्ययनों के नतीजों को संकलित कर उनकी समीक्षा की और पता लगाया कि फ्रक्टोज शर्करा वाले विभिन्न खाद्य पदार्थ मधुमेह और स्वस्थ्य रोगियों के रक्त शर्करा के स्तर को किस तरह से प्रभावित करते हैं। अध्ययन के बाद शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि कृत्रिम रूप से मीठे पेय लोगों को अन्य शर्करा वाले खाद्य पदार्थों की तुलना में टाइप 2 मधुमेह के खतरे को बढ़ा सकते हैं। अतिरिक्त फ्रक्टोज के साथ ज्यादा ऊर्जा देने वाले और कम पोषक तत्वों से तैयार पेय रक्त शर्करा के स्तर को हानिकारक रूप से बढ़ा देते हैं।
शहद, नेचुरल फ्रूट जूस से खतरा नहीं
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि जिन खाद्य और पेय पदार्थों में प्राकृतिक रूप से फ्रक्टोज मौजूद थे, उनमें कोई जोखिम नहीं मिला जैसे फल, सब्जियां, प्राकृतिक फलों के रस और शहद। जबकि मीठे पेय में जब अलग से फ्रक्टोज डालते हैं तो ये खून में पहुंचकर तेजी से रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ा देते हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. जॉन सिवेनपाइपर ने कहा, अध्ययन नतीजों से मधुमेह की रोकथाम और प्रबंधन में फ्रक्टोज के महत्व को समझ सकते हैं। इसके लिए अभी और बड़े स्तर पर अध्ययन की जरूरत है। उन्होंने आगे कहा, ‘जब तक अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं होती है, तब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवरों को पता होना चाहिए कि रक्त ग्लूकोज पर फ्रक्टोज शर्करा के हानिकारक प्रभाव ऊर्जा और खाद्य स्रोत के बीच होते हैं।
बेकरी की चीजें खाने से बचें
इससे पहले यह स्पष्ट नहीं था कि कौन सी मीठी चीजें खाई जा सकती हैं और कौन सी नहीं। लोग सोचते थे कि जिस भी चीजों में मीठा हो, उसे खाने से परहेज करना चाहिए। नए अध्ययन में इसे और स्पष्ट करते हुए यह समझाया गया है कि कोल्ड ड्रिंक, नाश्ते के लिए खाने वाली डिब्बाबंद चीजें, बेकरी उत्पाद, मीठे पकवान, इन सभी चीजों में अलग से चीनी डाली जाती है, इसलिए ये ज्यादा नुकसानदायक हैं।
अतिरिक्त कैलोरी भी घातक
शोधकर्ताओं की टीम ने अध्ययन में पाया कि फ्रक्टोज शर्करा वाले अधिकांश खाद्य पदार्थों का तब तक रक्त ग्लूकोज के स्तर पर हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है, जब तक कि अतिरिक्त कैलोरी नहीं देते हैं। मधुमेह के रोगियों में फलों रस और फल रक्त ग्लूकोज और इंसुलिन के नियंत्रण पर भी फायदेमंद असर डाल सकता है। लेकिन जिन खाद्य पदार्थों में पोषक तत्व कम होते हैं और ऊर्जा ज्यादा देते हैं, वो हानिकारक हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि फल की उच्च फाइबर सामग्री रक्त ग्लूकोज के स्तर में सुधार में मदद कर सकती है, क्योंकि यह शर्करा को धीरे-धीरे जारी करता है।
Thursday, September 27, 2018
र्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
ह एक नया सौदा था क्योंकि विमानों की क़ीमत, संख्या और शर्तें बदल गईं
थी. अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण का आरोप है कि नरेंद्र मोदी
ने नियमों का पालन नहीं किया.
सवाल ये है कि अगर यह नया ऑर्डर था तो नियमों के मुताबिक टेंडर क्यों जारी नहीं किए गए? यह भी पूछा जा रहा है कि इस फ़ैसले में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी की क्या भूमिका थी? अगर नहीं थी, तो क्यों नहीं थी?
तथ्य यह है कि डासो एविएशन के साथ सौदे की घोषणा होने के क़रीब एक साल बाद कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी ने इसे अपनी औपचारिक मंज़ूरी दी.
विमान की क़ीमत को लेकर सरकार संसद में जानकारी देने से कतराती रही है. सरकार ने विमान की कीमत बताने से यह कहते हुए इनकार किया कि यह सुरक्षा और गोपनीयता का मामला है. आरोप लगाने वाले बीजेपी से जुड़े रहे दोनों पूर्व कैबिनेट मंत्रियों का कहना है कि नियमों के मुताबिक, गोपनीयता सिर्फ़ विमान की तकनीकी जानकारी के बारे में बरती जाती है, कीमत के बारे में नहीं.
अरुण शौरी का कहना है कि लोकसभा में एक सवाल के जवाब में, रक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुभाष भामरे ने 36 विमानों वाला सौदा होने से पहले बताया था कि एक विमान की कीमत 670 करोड़ रुपए के करीब होगी. अरुण शौरी पूछ रहे हैं कि हर विमान का दाम लगभग एक हज़ार करोड़ रुपए बढ़ गया है, अब एक विमान की कीमत 1600 करोड़ रुपए के क़रीब है.
क्या सरकार की ज़िम्मेदारी देश को यह बताना नहीं है कि ख़ज़ाने से लगभग 36 हज़ार करोड़ रुपए ज़्यादा क्यों ख़र्च हो रहे हैं? सरकार के मंत्रियों ने बचाव में कहा है कि विमान में बहुत सारे साज़ो-सामान और हथियार अलग से लगाए गए हैं इसलिए क़ीमत बढ़ी है.
संसद में दी गई जानकारी के आधार पर लोग आरोप लगा रहे हैं कि जो पिछला सौदा हुआ था उसमें सभी अतिरिक्त साज़ो-सामान और हथियारों की भी क़ीमत में शामिल थी. सरकार को बताना चाहिए कि क़ीमत का सच क्या है?
जिस दिन नरेंद्र मोदी ने पेरिस में विमान ख़रीद के समझौते पर हस्ताक्षर किए, वह तारीख़ थी 10 अप्रैल 2015. 25 मार्च 2015 को रिलायंस ने रक्षा क्षेत्र की एक कंपनी बनाई जिसे सिर्फ़ 15 दिन बाद लगभग 30 हज़ार करोड़ का ठेका मिल गया.
एक ऐसी कंपनी जिसने रक्षा उपकरण बनाने के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया है, दिल्ली मेट्रो हो या टेलीकॉम का बिज़नेस, कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड पर लगातार सवाल उठते रहे हैं, अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनी का ज़िक्र भारी क़र्ज़ की वजह से भी होता रहा है. ऐसे में फ्रांसीसी कंपनी अपनी मर्ज़ी से ऐसा पार्टनर क्यों चुनेगी यह एक पहेली है.
सौदे के समय फ्रांस के राष्ट्रपति रहे फ्रांस्वा ओलांद ने एक इंटरव्यू में कहा कि 'रिलायंस के नाम की पेशकश भारत की ओर से हुई थी, उनके सामने कोई और विकल्प नहीं था'. सफ़ाई में सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि यह 'राहुल-ओलांद की जुगलबंदी' है, एक 'साज़िश' है.
मोदी सरकार के मंत्रियों का कहना है कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, लेकिन क्या उसे 'क्रोनी कैपिटलिज़्म' के गंभीर आरोप पर खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करनी चाहिए?
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है कि यह 'परसेप्शन' की लड़ाई है जिसमें कांग्रेस झूठ बोल रही है यानी जितने सवाल पूछे जा रहे हैं उनका जवाब देने की कोई ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ ये परसेप्शन बनाने की ज़रूरत है कि सरकार पाक-साफ़ है या कांग्रेस ज़्यादा गंदी है.
राहुल गांधी ने कहा है कि "मोदी ने देश के युवाओं और वायु सेना से तीस हज़ार करोड़ रुपए छीनकर अनिल अंबानी को दे दिए हैं." यह ऐसा आरोप है जिसे अब तक मौजूद जानकारी से साबित करना मुमकिन नहीं है लेकिन वे भी परसेप्शन की लड़ाई जीतने में लगे हुए हैं.
भारत में शायद ही कोई बड़ा रक्षा सौदा हुआ हो और उसमें घोटाले, दलाली और रिश्वतख़ोरी के आरोप न लगे हों लेकिन किसी भी मामले में आरोप साबित नहीं होते, सवालों के जवाब नहीं मिलते.
रफ़ाल मामले में भी क्या ऐसा ही होगा? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के जागरूक नागरिकों को टीवी पर 'तू चोर', 'तेरा बाप चोर' वाला ड्रामा देखकर संतोष करना होगा या परसेप्शन की लड़ाई में कुछ तथ्य और तर्क भी सामने आएँगे?
क्या पता, देखते जाइए!
सवाल ये है कि अगर यह नया ऑर्डर था तो नियमों के मुताबिक टेंडर क्यों जारी नहीं किए गए? यह भी पूछा जा रहा है कि इस फ़ैसले में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी की क्या भूमिका थी? अगर नहीं थी, तो क्यों नहीं थी?
तथ्य यह है कि डासो एविएशन के साथ सौदे की घोषणा होने के क़रीब एक साल बाद कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी ने इसे अपनी औपचारिक मंज़ूरी दी.
विमान की क़ीमत को लेकर सरकार संसद में जानकारी देने से कतराती रही है. सरकार ने विमान की कीमत बताने से यह कहते हुए इनकार किया कि यह सुरक्षा और गोपनीयता का मामला है. आरोप लगाने वाले बीजेपी से जुड़े रहे दोनों पूर्व कैबिनेट मंत्रियों का कहना है कि नियमों के मुताबिक, गोपनीयता सिर्फ़ विमान की तकनीकी जानकारी के बारे में बरती जाती है, कीमत के बारे में नहीं.
अरुण शौरी का कहना है कि लोकसभा में एक सवाल के जवाब में, रक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुभाष भामरे ने 36 विमानों वाला सौदा होने से पहले बताया था कि एक विमान की कीमत 670 करोड़ रुपए के करीब होगी. अरुण शौरी पूछ रहे हैं कि हर विमान का दाम लगभग एक हज़ार करोड़ रुपए बढ़ गया है, अब एक विमान की कीमत 1600 करोड़ रुपए के क़रीब है.
क्या सरकार की ज़िम्मेदारी देश को यह बताना नहीं है कि ख़ज़ाने से लगभग 36 हज़ार करोड़ रुपए ज़्यादा क्यों ख़र्च हो रहे हैं? सरकार के मंत्रियों ने बचाव में कहा है कि विमान में बहुत सारे साज़ो-सामान और हथियार अलग से लगाए गए हैं इसलिए क़ीमत बढ़ी है.
संसद में दी गई जानकारी के आधार पर लोग आरोप लगा रहे हैं कि जो पिछला सौदा हुआ था उसमें सभी अतिरिक्त साज़ो-सामान और हथियारों की भी क़ीमत में शामिल थी. सरकार को बताना चाहिए कि क़ीमत का सच क्या है?
जिस दिन नरेंद्र मोदी ने पेरिस में विमान ख़रीद के समझौते पर हस्ताक्षर किए, वह तारीख़ थी 10 अप्रैल 2015. 25 मार्च 2015 को रिलायंस ने रक्षा क्षेत्र की एक कंपनी बनाई जिसे सिर्फ़ 15 दिन बाद लगभग 30 हज़ार करोड़ का ठेका मिल गया.
एक ऐसी कंपनी जिसने रक्षा उपकरण बनाने के क्षेत्र में कोई काम नहीं किया है, दिल्ली मेट्रो हो या टेलीकॉम का बिज़नेस, कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड पर लगातार सवाल उठते रहे हैं, अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनी का ज़िक्र भारी क़र्ज़ की वजह से भी होता रहा है. ऐसे में फ्रांसीसी कंपनी अपनी मर्ज़ी से ऐसा पार्टनर क्यों चुनेगी यह एक पहेली है.
सौदे के समय फ्रांस के राष्ट्रपति रहे फ्रांस्वा ओलांद ने एक इंटरव्यू में कहा कि 'रिलायंस के नाम की पेशकश भारत की ओर से हुई थी, उनके सामने कोई और विकल्प नहीं था'. सफ़ाई में सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि यह 'राहुल-ओलांद की जुगलबंदी' है, एक 'साज़िश' है.
मोदी सरकार के मंत्रियों का कहना है कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, लेकिन क्या उसे 'क्रोनी कैपिटलिज़्म' के गंभीर आरोप पर खुलकर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करनी चाहिए?
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने कहा है कि यह 'परसेप्शन' की लड़ाई है जिसमें कांग्रेस झूठ बोल रही है यानी जितने सवाल पूछे जा रहे हैं उनका जवाब देने की कोई ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ ये परसेप्शन बनाने की ज़रूरत है कि सरकार पाक-साफ़ है या कांग्रेस ज़्यादा गंदी है.
राहुल गांधी ने कहा है कि "मोदी ने देश के युवाओं और वायु सेना से तीस हज़ार करोड़ रुपए छीनकर अनिल अंबानी को दे दिए हैं." यह ऐसा आरोप है जिसे अब तक मौजूद जानकारी से साबित करना मुमकिन नहीं है लेकिन वे भी परसेप्शन की लड़ाई जीतने में लगे हुए हैं.
भारत में शायद ही कोई बड़ा रक्षा सौदा हुआ हो और उसमें घोटाले, दलाली और रिश्वतख़ोरी के आरोप न लगे हों लेकिन किसी भी मामले में आरोप साबित नहीं होते, सवालों के जवाब नहीं मिलते.
रफ़ाल मामले में भी क्या ऐसा ही होगा? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के जागरूक नागरिकों को टीवी पर 'तू चोर', 'तेरा बाप चोर' वाला ड्रामा देखकर संतोष करना होगा या परसेप्शन की लड़ाई में कुछ तथ्य और तर्क भी सामने आएँगे?
क्या पता, देखते जाइए!
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